मंगलवार, 30 जून 2015

शिलांग यात्रा - पाँचवां दिन (कामाख्या देवी मन्दिर)

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बरसों से चले आ रहे धार्मिक कलह को आगे बढाने का मेरा यहां कोई इरादा नहीं है। अगर किसी की भावनाऐं आहत हों तो मुझे माफ़ कीजिऐगा, लेकिन स्थापित सत्य से कोई भी इसांन, चाहे वो किसी भी मजहब से ताल्लुक रखता हो, मुकर नहीं सकता है। हिन्दु धर्म में अन्य धर्मों की तरह भले ही बहुत से अंधविश्वास और कुरीतियां हो लेकिन युगों से फल-फूल रही इस सनातन विचारधारा ने कुछ ऐसे मापदंडों, नियमों और रीतियों-नीतियों को विकसित किया है जिनका यदि दृढता के पालन किया जाऐ तो जीवन के चारों आश्रम बहुत सहजता से व्यतीत हो जाऐगें, बेखटके। यकीनन इन्हें जीवन के कुशल संचालन हेतु ही बनाया गया है जो यदि टुटते हैं तो प्रतिफल के रुप में दुख ही मिलता है, फिर चाहे ये भगवान से टुटें या इंसान से। हिन्दु धर्म के अनेक नियमों में वे कसम भी शामिल हैं जो पडिंत महाराज आपको विवाह के फेरों की रस्म के समय खिलाता है। याद कीजिऐ इनमें पत्नी को एक कसम खिलाई जाती है कि अपने पति की आज्ञा के बिना वो कहीं नहीं जाऐगी यहां तक कि मायके भी नहीं। खटपट शुरु ही तब होती है जब पति-पत्नी इन खाई हुई कसमों की उल्टी शुरु कर देते हैं अर्थात इनका पालन नहीं करते। इंसानों का हाल तो आप सर्वत्र देख ही रहे हैं लेकिन जब ईश्वर तक इन नियमों को तोङते हैं तो रिज़ल्ट क्या निकलते हैं इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण तो भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे शक्तिपीठ ही हैं।

रविवार, 28 जून 2015

शिलांग यात्रा - चौथा दिन (शिलांग से गुवाहाटी)

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आज सुबह छह बजे आँख खुली तो ख़ुद को काफी तर-ओ-ताज़ा पाया। मैं फिलवक्त शिलांग के पुलिस बाज़ार के एक होटल में हुँ और उत्तर-पूर्व भारत की अपनी इस यात्रा पर कल ही यहां पहुँचा हुँ। भारत के प्रतिष्ठित सरकारी प्रबंधन संस्थानों "इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट" की कङियों में सें एक शिलांग में भी है। इसका पूरा नाम है- राजीव गांधी भारतीय प्रबंधन संस्थान, जोकि पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के नाम पर रखा गया है। इसी प्रतिष्ठित संस्थान में आज भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की मेघालय सर्कल की मेरी परिक्षा भी है जिसका समय निर्धारित है प्रातः ग्यारह बजे। शिलांग में उत्तर-पूर्व भारत को समर्पित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय "नार्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी" भी है। तो मैं उठा और होटल से निकलने के उपक्रम करने लगा। दैनिक कार्यों से निवृति के बाद नहा-धोकर अपना बैग पैक किया और लगभग आठ बजे होटल से निकल गया। आसमान बादलों से भरा हुआ था ओर हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। पूरी संभावना थी कि जमकर बारिश होगी। शिलांग वैसे भी चेरापूँजी (Cherrapunji) और मौसीनरम (Mawsynram) के पास ही है जो पूरे विश्व में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान माना जाता है। अनुमान के अनुसार यहां वर्षा की औसत वार्षिक दर बारह हजार मिलीमिटर से भी अधिक है। आप स्वयं ही सोचिऐ कि इतने सारे पानी का यदि बेहतर संचयन और दोहन किया जाऐ जाऐ तो निचले इलाकों की पानी की कमी की समस्या का कुछ समाधान किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश की कुल्ह व्यवस्था यहां भी आज़माई जा सकती है (हालांकि कुल्ह की कद्र अब इसके ग्रह प्रदेश में ही नहीं है।) किसी को कोई फिक्र ही नहीं। कुछ हद तक लोग भी यथा राजा तथा प्रजा की तरह हो गऐ हैं। न प्रशासन को फिक्र, न ही शासन को और न ही शाासितों को।

बुधवार, 24 जून 2015

शिलांग यात्रा - तीसरा दिन (गुवाहाटी से शिलांग)

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उत्तर-पूर्व भारत की अपनी इस यात्रा पर निकले मुझे दो दिन हो गये हैं। कल रात ग्यारह बजे सोने के बाद अचानक जब आँख खुली तो ट्रेन को रूका हुआ पाया। सोचा कि चलो देखते हैं कहां तक पहुँचे। गाङी से उतरकर उन्नींदी आँखों से इधर-उधर देखा, सामने बोर्ड लगा था- गुवाहाटी। ओ तेरी... पहुँच गया मैं तो। भाग कर गाङी के अंदर गया और अपना सामान उतार लाया। बस इतना भर होने की देर थी कि गाङी ने चलने के लिए सीटी बजा दी। माँ कामाख्या बचा लिया तुमने वरना पता नहीं कहां से बैक-रेस लगानी पङती।

मंगलवार, 23 जून 2015

शिलांग यात्रा - दूसरा दिन

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उत्तर-पूर्व की अपनी इस यात्रा की शुरुआत मैनें कल बहादुरगढ से की थी। दिल्ली, मुरादाबाद, बरेली होते हुऐ कल शाम तक मैं लखनऊ पहुँच गया था। मेरी सीट कन्फर्म नहीं थी और रात में गोंडा जंक्शन के आस-पास किसी तरह सीट का जुगाङ भिङा कर अपने सोने का इंतज़ाम किया था। आज तङके जब उठा तो पूरा बदन अकङा-सा महसूस हुआ। पैरों की हड्डियां शिकायत रही थी कि हमारी जगह और सीरत नीचे की ओर होती है जबकि तुमने हमें सारी रात आसमान की ओर उठाऐ रखा। मैने उन्हें पुचकार दिया कि अभी तो इब्तिदा-ए-इश्क है सनम, आगे-आगे देखिऐ होता है क्या...

सोमवार, 22 जून 2015

शिलांग यात्रा - प्रस्थान दिवस

एक सरकारी मुलाज़िम अपने भविष्य को लेकर सुरक्षित रहता है, यह मेरा मानना है। कम से कम यह चिंता तो नहीं ही रहती कि किसी छोटी-मोटी चूक के कारण उसे नौकरी से निकाल बाहर किया जायेगा। मैं अभी तक सरकारी नौकरी के इसी रौब और सुरक्षित भविष्य की गारंटी से महरूम हुँ। सीमित संसाधनों और आजीविका कमाने के चक्कर में बहुधा लोग अपने शौक पूरे नहीं कर पाते। मैं कोई अपवाद नहीं हुँ और इस पी़ङा को भली-भांति समझता हुँ। घुमक्कङी मेरा शौक जो है और धीरे-धीरे जैसे मेरे डी.एन.ए. में रमता जा रहा है। यही नही अक्सर कोढ में खाज की तरह मेरे साथ होता ये भी होता है कि जब कहीं निकलने का प्लान बनाने लगता हूँ तो घर वाले सवालों और आपत्तियों की बँदूक मेरी छाती पर तान देते हैं। कोई कहता है- क्यूँ पैसे ख़राब कर रहा है। कोई कहता है- ऐ बेटा मेरा तो पहले तै ऐ जी घबरावे है, मत जा। और भी कोई कुछ कहता है तो कोई कुछ। पर बंदे में घुमक्कङी का ऐसा कीङा है कि सब काम निकल जाऐ एक ऐसा बीच का रास्ता निकाल लिया। सरकारी नौकरीयों के दुर-दुर के फॉर्म भरने भी शुरु कर दिऐ। घुमक्कङी की घुमक्कङी और साथ ही नौकरी की तलाश। इस यात्रा-वृतांत से पहले भी मैं कई जगह घुम चुका हुँ जैसे हरिद्वार साईकिल यात्रा 2002 में, नौ देवी यात्रा (जिसमें नैना देवी, ज्वालामुखी, चिंतपूर्णी, वैष्णों देवी आदि शामिल है) 2003 में, देहरादून-मसूरी यात्रा 2007 में, चंडीगढ यात्रा 2008 में, देहरादून-सहस्त्रधारा यात्रा 2009 और बीच-बीच में कई अन्य छोटी-मोटी यात्राऍ। लेकिन दोस्तों, 2011 में की गई अपनी इस उत्तर-पूर्व भारत की यात्रा को लेकर मैं पहली बार आपके बीच हूँ। हालांकि इसी साइट पर इससे पहले मैं वैष्णों देवी यात्रा 2011 भी प्रकाशित कर चुका हुँ।

तो आइये चलते हैं शिलांग की यात्रा पर कुछ कदम मेरे साथ।

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