शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

स्पीति जाने के लिये मार्गदर्शिका (वाया मनाली)

मनाली से होकर स्पीति जाने के लिये मार्गदर्शिका विस्तृत रुप में इस पेज पर नीचे प्रकाशित की गई है। संपूर्ण टिप्स वाले पेज हेतू यहां क्लिक करें। शिमला-किन्नौर से काजा वाले रुट के लिये यहां क्लिक करें
  1. कब जायें 
  2. कैसे जायें 
  3. यात्रा प्लान 
  4. दर्शनीय स्थलों की सूची 
  5. रात्रि-विश्राम

स्पीति जाने के लिये मार्गदर्शिका (वाया शिमला-किन्नौर)

शिमला-किन्नौर से होकर स्पीति जाने के लिये मार्गदर्शिका विस्तृत रुप में इस पेज पर नीचे प्रकाशित की गई है। संपूर्ण टिप्स वाले पेज हेतू यहां क्लिक करें। मनाली से काजा वाले रुट के लिये यहां क्लिक करें
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  5.  रात्रि-विश्राम

स्पीति टूर गाईड

स्पीति, एक ऐसी जगह जो हर मौसम में अपने अलग-अलग रंग दिखाती है। जो वहां नहीं गये वो स्पीति के न जाने कितने रुप मन में बसाये फिरते हैं। किन्नौर-स्पीति-लाहौल घाटियों का सफर उत्तेजना और रोमांच से भर देता है। किसी भी अन्य यात्रा के मुकाबले स्पीति भ्रमण बेहद दुर्गम है। कोई अगर लद्दाख हो आया है और अपने आप को तीस मार खाँ समझे तो स्पीति के यात्री भी किसी भी तरह से पच्चीस मार खाँ नहीं है। लद्दाख और स्पीति में समान भौगोलिक परिस्थितियां मिलती हैं। दुर्गमताओं को पार करने का इनाम हर मोङ पर मिलता है। हिमालय हर बार नये रुप में सामने होता है। दूसरी चीजें भी बदलती जाती हैं, जैसे लोग, भाषा, भूगोल, सङक, सब कुछ यहां तक कि कई मायनों में खुद आप भी। मुख्यतः काजा ही स्पीति का मध्य-बिंदु है और आप जैसे-जैसे इस केन्द्र की ओर बढते जायेंगें तो स्थानिय बोली, सङक और भूगोल जटिल होते जायेंगें लेकिन स्थानिय लोग और उनका व्यवहार सरल होता जायेगा। इस पर भी संवाद की ओर से तनिक भर भी परेशान होने की जरूरत नहीं चूंकि हिन्दी खूब बोली और समझी जाती है। “हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा” शीर्षक के साथ इसी ब्लॉग पर छह अंकों में प्रकाशित किया गया यात्रा-वृतांत दिल्ली-काजा-दिल्ली भ्रमण का उम्दा मार्गदर्शक है। तो भी इस लेख के जरिये स्पीति यात्रा से जुङी हर जिज्ञासा को वन-स्टॉप-सर्च के आधार पर पूरी करने का प्रयास किया जायेगा।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कुल्लू से दिल्ली) भाग-06

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का पांचवा और अंतिम रैन-बसेरा सिद्ध हुआ कुल्लू। कल मैं और रविन्द्र अपनी मोटरसाईकिल को लोसर से एक गाङी में लादकर यहां तक लाये थे और आज दिल्ली (अपने घर) की ओर कूच कर दिया जायेगा। पर उससे पहले चंद बातें कुल्लू के बारे में कर लें। पर्यटन में मनाली के प्रभुत्व के आगे कुल्लू दबा हुआ सा दिखता है। ऐसे सैलानियों की कोई कमी नहीं जो कुल्लू-मनाली घूमने की कहकर घर से निकलते हैं पर मनाली और रोहतांग देखकर वापस हो लेते हैं। जबकि हकीकत तो ये है कि हर तरह के मौसम और हर तरह के सैलानी के लिये इधर का प्रवेश-द्वार कुल्लू ही है। हर दिल अजीज़ रोहतांग, मनाली, मणिकर्ण, नग्गर आदि के बारे में तो सब जानते ही हैं। इन सब के मार्ग कुल्लू से ही निकलते हैं। खीरगंगा, बिजली महादेव, चंद्रखनी, मलाणा जैसे मध्यम दर्जे के ट्रेकों के लिये भी यहीं से मार्ग निकलते हैं। हाई-ऑल्टीट्यूड ट्रेकिंग रूट जैसे सारा-उमगा और हामता पास भी कुल्लू से ही निकलते हैं जो कुंजुंम पास और बारालाचा-ला होते हुये सीधे लद्दाख में पहुँचा देते हैं। और तो और बगैर किन्नौर जाये पिन-पार्वती पास से होकर सीधे स्पीति के गढ काजा तक भी कुल्लू से जाया जा सकता है। कुल्लू स्वयं अपने भीतर अनेक आकर्षण समेटे हुये है। रघुनाथ और श्रृंग ऋषि जैसे अनेक मंदिर हैं, फिशिंग और राफ्टिंग के लिये ब्यास है, बौद्ध मठ भी हैं। कुल्लू का दशहरा तो विश्व-प्रसिद्ध है ही। क्या कुछ नहीं है कुल्लू में?

शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (लोसर से कुल्लू) भाग-05

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का चौथा रैन-बसेरा लोसर तेरह हजार फीट से ज्यादा की उंचाई पर स्थित है। यह उंचाई बहुत तो है पर इतनी भी अधिक नहीं कि इंसान प्राण त्याग दे। तेरह हजार फीट तक ऑक्सीजन का स्तर इतना भी नहीं गिर जाता। हिमालय के इस पार तो चौदह-पन्द्रह हजार फीट की उंचाई वैसे भी आम होती है। पर गर्म मैदानों के प्राणियों के शरीर का क्या भरोसा? खुद को महामहिम समझने वाले बहुत से मैदानी जब स्पीति और लद्दाख की ऐसी उंचाईयों पर पहुँचते हैं तो उन्हें अपनी असली औकात पता चल जाती है। आमतौर पर यूं भी शांत ही रहने वाला मैं, इन पहाङों की असीमता के आगे नतमस्तक होकर और भी शांतचित हो गया। ये ऐसी जगहें हैं जो निःशब्द रहकर आदमी को उसके बौनेपन का सतत् बोध कराती रहती है।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (चांगो से लोसर) भाग-04

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चौथा दिन और आज किन्नौर से आऊट हो जाने की तैयारी। कल जब चांगो पहुँचा था तो जीभ में कसक थी इसके सेब परखने की। चांगो के सेब बहुत ही उम्दा क्वालिटी के बताये जाते हैं। ये नौ हजार फीट से भी ज्यादा की उंचाई पर फलते हैं। लेकिन शाम ही से घर की याद आने लगी थी। जी करता था कि बस कैसे भी उङकर अभी घर पहुँच जाउं लेकिन मैं नभचर तो नहीं। काश होता! रविन्द्र का भी यही हाल था। मैं पहले भी घर से बाहर कई-कई दिनों तक रह चुका हूँ, वो भी ऐसी परिस्थितियों में जबकि जेब में पैसे तक नहीं बच पाते थे खाने के लिये। शिलांग भ्रमण के दौरान 2500 रूपये से भी कम खर्चे में एक सप्ताह की यात्रा कर डाली थी जिसमें दिल्ली से आने-जाने का किराया, होटल और खाना सब कुछ शामिल है। एक यात्रा और भी है जब 12 दिनों की यात्रा मात्र 1200 रूपये में निपटा दी थी। पर अब से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। अब तो काम चलाने योग्य पैसे भी जेब में रहते ही हैं। फिर भी अब ऐसा क्यों?
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