मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

अंगारों की आंच पर जन्नत : खतरे और मुश्किलात

जैसा कि मैनें यात्रा-वृतांत की शुरूआत में ही फूलों की घाटी को सरकारी उपेक्षा का शिकार बताया था। सरकार इस घाटी में घुसने के डेढ सौ रूपये प्रति यात्री लेती है। विदेशियों के लिये तो यह रकम चार गुनी अधिक है। कोई डॉक्यूमेंट्री या व्यवसायिक वीडियो फिल्माने का शुल्क दस हज़ार रूपये से एक लाख रूपये तक है। एक एंट्री तीन दिनों तक मान्य होती है। यानि सरकार ने इसे राजस्व कमाने का अच्छा साधन बना लिया है। इस पर सरकार कोई सुविधा यात्रियों को देती हो, ऐसा नज़र नहीं आता। किसी भौतिक सुविधा की बात तो भूल ही जाईये, मूलभूत सुविधायें तक नदारद हैं। घाटी में घुसते ही अनेक नालों का बहाव पगडंडी से होकर गुज़रता है। कुछ तो काफी बङे हैं, जैसे कि प्रियदर्शिनी नाला, जिन पर पुल के नाम पर बल्लियां डाल दी जाती हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर ही इन्हें पार करना होता है। किसी मुश्किल घङी में साथ देने के लिये वन-विभाग का कोई कर्मचारी भी नहीं होता है। ये सही है कि घाटी के संरक्षण के लिये यहां रात को रूकना मना है लेकिन दिन में भी किसी आपात स्थिति में सिर छुपाने की कोई व्यवस्था नहीं है।

सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

फूलों की घाटी (यात्रा सुझाव, गाईड एवम् नक्शे)


1. कब जायें
2. कैसे जायें
3. फूलों की घाटी यात्रा प्लान
4. यात्रा प्लान के लिये सुझाव
5. रात्रि-विश्राम
6. महत्वपूर्ण संसाधनों की उपलब्धतायें

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-4

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) : भाग-1 | भाग-2 | भाग-3 | भाग-4 | भाग-5 | भाग-6

फूलों की घाटी यात्रा का आज अंतिम दिन था और छुट्टी का भी। 24 घंटे में दिल्ली पहुंच जाना है ताकि समय से काम पर लौट सकूं। गोविंदघाट से दिल्ली बहुत दूर तो नहीं है, यही कोई साढे पांच सौ या पौने छह सौ किलोमीटर है। 24 घंटे में तो आसानी से पहुंच सकते हैं। लेकिन एक तो आधे से ज्यादा पहाङी रास्ता और उपर से मैं अब व्हीकल को धीरे भी चलाने लगा हूं, 70 की स्पीड भी तब पकङता हूं जब कोई इमरजेंसी आ जाये। फिर भी उम्मीद है कि आज सवेरे सवेरे निकल कर लगातार चलते हुये कल सवेरे तक घर पहुंच ही जाउंगा।

रविवार, 9 अक्तूबर 2016

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-3

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) : भाग-1 | भाग-2 | भाग-3 | भाग-4 | भाग-5 | भाग-6

चमोली जिले में तिब्बत-भारत सीमा से कुछ ही दूर स्थित है फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, जो नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के साथ मिल कर संयुक्त रूप से नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व का निर्माण करता है। भौगोलिक रूप से यह जगह वृहद हिमालय और जांस्कर श्रेणियों के मध्य स्थित है, हालांकि बहुतेरे लोग इसे जांस्कर का ही एक भाग मानते हैं। घाटी का कुल क्षेत्रफल करीब 87 वर्ग किलोमीटर है, हालांकि इसका 70 प्रतिशत भाग हिम से ढका रहता है। शेष क्षेत्र में 520 वनस्पतियों की पहचान अब तक की गई है, जिसमें से 500 से अधिक प्रजातियां फूलों की हैं।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-2

आज हमें जोशीमठ से निकल कर पहले गोविंदघाट जाना था। वहां गाङी को पार्किंग में लगाकर ट्रैक शुरू करना था। हालांकि अब गोविंदघाट से तीन किलोमीटर आगे पुलना गांव तक सङक बन गई है लेकिन इस पर आप अपनी गाङी लेकर ना जायें चूंकि पुलना में कार पार्किंग की सुविधा नहीं है। हां, मोटरसाईकिलों के लिये पार्किंग की अच्छी सुविधा है। गोविंदघाट से पुलना तक जीप चलती हैं। उनमें भी जा सकते हैं या फिर पैदल भी निकल सकते हैं। हमने जीप पकङी और बीस मिनट में पुलना जा पहुंचे।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-1

बेनज़ीर कुदरती खूबसूरती, दुर्लभ हो चुकीं उच्च पर्वतीय वनस्पतियों व जीवों का ठिकाना और सरकारी उपेक्षा का शिकार एक ऐसा स्वर्ग जिसकी मिसाल पूरे हिमालय में और कहीं भी नहीं है। जी हां मित्रों, ये आगाज़ है मेरी फूलों की घाटी की यात्रा का। और मुझे पूरा यकीन है कि यह यात्रा-वृतांत आपको एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू करायेगा। वर्ष 2004 में फूलों की घाटी को युनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित करने हेतू नामांकित किया गया था और एक वर्ष बाद यानि वर्ष 2005 में इसे युनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया। अब यह घाटी भारत में मौजूद कुल 35 विश्व विरासत धरोहरों में से एक है। तो चलिये चले चलते हैं देवभूमि उत्तराखंड में स्थित फूलों की घाटी की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ...

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

खीरगंगा ट्रेक, कुल्लू, हिमाचल प्रदेश

2016 में पहली जनवरी से ही घुमक्कङी का आगाज़ कर डाला, जब औली-गोरसों बुग्याल जाना हुआ। फिर अगले ही महीने पंजाब का किला रायपुर स्पोर्टस फेस्टिवल देखा। मार्च में हरिद्वार, ऋषिकेश और मुनि की रेती घुम कर आया। मई के पहले ही दिन निकला तो नारकंडा के लिये था, मगर जा पहुँचा - खीरगंगा।

तो जी औली-गोरसों की तरह खीरगंगा भी एक ग्रुप को ही लेकर जाना हुआ। हुआ यूँ कि अपने दो-तीन दोस्त कहीं घुमने जाना चाहते थे। मैं अक्सर कहीं न कहीं के लिये निकलता रहता ही हूँ सो उन्होंने मुझसे संपर्क कर लिया। फरमाईश आई कि किसी ठंडी, नज़दीकी और सस्ती जगह ले चलो जहां भीङ-भाङ भी ना हो। अब दिल्ली के आस-पास की ऐसी कुछ जगहों के विकल्प मैंने उन्हें दे दिये। भाई लोगों को नारकंडा जँच गया। कार अपने पास है ही, खाने-पीने और रात को रूकने के खर्चे के अनुमान लगा कर मैंने चट से एस्टीमेट भेज दिया। पट से उधर से कन्फर्मेशन आ गई। पहली मई की शाम को निकलना तय हो गया।

तय दिन को अपने तीनों दोस्तों के ग्रुप को पिक किया और निकल पङे नेशनल हाईवे नंबर एक की ओर। करनाल से निकले ही थे कि एक बंधु कहने लगे कि नारकंडा तो देखा-सुना है, कहीं और ले चलो। मैंने कहा कि भाई ठहरी तो नारकंडा की थी, अब अचानक क्या हुआ? फिर अब रात-रात में कहां का प्रोग्राम बनायें? बोला कि कहीं का भी, पर नारकंडा नहीं। धीरे-धीरे उस्ताद ने बाकियों की वोट भी अपनी ओर कर ली। तो अपन ने कहा कि सीट को पीछे कर के लेट जाओ और सो जाओ आराम से। अब सुबह ही पता चलेगा कि कहां पहुँचेंगें। यारों को आराम से सुलाकर अपने दिमाग के घोङे दौङाने शुरू कर दिये। दो दिन का सीमित समय था, उसके बाद सभी को अपने कामों पर लौटना था। गाङी सङक पर चलती रही और दिमाग आसमान में उङता रहा। बीसियों जगहों के बारे में सोच डाला पर कहीं का फाईनल नहीं हुआ। सोचते सोचते जीरकपुर जा पहुँचे, पर कहीं भी पहुँचना फाईनल नहीं हुआ। फिर सोचा चंडीगढ पहुँचते हैं फिर देखते हैं। सिटी ब्यूटीफुल में इण्ट्री हुई भी नहीं थी कि अचानक दिमाग़ में आया - खीरगंगा। और दो मिनट भी नहीं लगे इस पर मोहर मारने में।

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